वो कोई और नहीं मेरा दोस्त मनुज था

नमस्कार दोस्तों
मै रमन राणा, दामन हरियाणा संगठन का सदस्य व मिडिया प्रभारी आज फिर से अपनी एक रचना के साथ आप सब के समक्ष आया हूँ। मेरी पिछली रचना “मैंने दहेज़ नहीं माँगा” को आप सबने बहुत सराहा और वहीँ से मुझे प्रेरणा मिली एक और कविता लिखने की।
ये कविता किसी समाजिक बदलाव या पीड़ित पुरुष के बारे में नहीं है, बल्कि उस इंसान के बारे में है जिसकी वजह से आज हम लोग साथ हैं और एकजुट हैं।
“वो कोई और नहीं, वो मेरा दोस्त मनुज था”

ज़िन्दगी में एक बार कुछ ऐसे वक्त से मुलाक़ात हुई,
कुछ तजुर्बों और संघर्षो की मानो शुरुवात हुई।
कोई राह न मिली, कहाँ जाऊं, किसे खोजूं,
कैसे समस्या का हल निकालू, कैसे समाधान सोचूं।
तभी एक शख्स मिला, जिसके जीवन में भी संघर्ष था,
वो कितनों का चाहिता था, कितनों का आदर्श था,
हिम्मत, साहस और जूनून, उसके पास वो सबकुछ था,
“वो कोई और नहीं, वो मेरा दोस्त मनुज था”
Manuj 01
वो हमारे हकों के लिए हमेशा लड़ा था,
हर हालात, हर कठिनाई में भी हमारे साथ खड़ा था,
आखरी सफ़र भी उसका, हमारे लिए ही रहा,
न हमसे वो कुछ बोला, न हमसे कुछ कहा।
संघर्ष की दूसरी मिसाल तो यारों, वो खुद था,
“वो कोई और नहीं, वो मेरा दोस्त मनुज था”
वो कभी हमारा दोस्त बना, कभी अध्यापक बन गया,
छोटी सी उम्र में, दामन का वो संस्थापक बन गया।
मुश्किलों से लड़ने का जरिया वो हमे सदा सिखलाता था,
हम न समझते, तो भारी आवाज़ में समझाता था।
सीमाएं उसे न बाँध सकी, सिपाही वो अनिरुध था,
“वो कोई और नहीं, वो मेरा दोस्त मनुज था”
Manuj 13
अब सोचता हूँ काश, तुझे उस दिन पास न बुलाते,
अपने अपने शहर में रहकर ही सब पुरुष दिवस मनाते,
पर क्या पता था, ये हादसा हो जायेगा,
हमारे लिए किया सफ़र ही, तेरा आखरी बन जायेगा,
हर ख़ुशी तो मानो जैसे उस दिन से ही सोई है,
ये कविता लिखते-लिखते रमन की कलम भी रोई हैं।
हमारा भाई, मित्र, हमसफ़र, वो हमारा सबकुछ था,
“वो कोई और नहीं, वो मेरा दोस्त मनुज था”
“वो कोई और नहीं, वो मेरा दोस्त मनुज था”
पूरे दामन परिवार कि ओर से हमारे प्यारे भाई को श्रद्धांजलि स्वरूप…
दामन परिवार के हृदय में मनुज हमेंशा रहेगा…

यही मेरे भी प्यार के श्रद्धा सुमन हैं… रमन राणा…!!
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