TEXTBOOKS AND FEMINIST PROPAGANDA

Save Bengali Family

Textbooks are being used by feminist for Feminist propaganda among students in India.

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The National Council of Educational Research and Training (NCERT) was established in 1961, which was set up by the Government of India, with headquarters located at Sri Aurbindo Marg in New Delhi, to assist and advise the central and state governments on academic matters related to school education. The NCERT publishes textbooks for school subjects from Classes I to XII. NCERT Text-books are used in government and private schools across India that follow the CBSE curriculum. The Central Board of Secondary Education (CBSE) established in the year 1929, enjoys today the distinction of being one of the oldest and largest Board of Secondary Education in India. It has more than 16,000 affiliated schools in India and across 24 other countries of the world.

Hence the reach of NCERT Textbooks is large and feminist have used it as…

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A REAL SOLDIER

Army / CRPF told him never bow down under any pressure. Army / CRPF told him never breakdown under difficult situations. Army / CRPF told him you are soldier and fight is your religion. Army / CRPF told him to identify enemy and destroy.

He identify his real enemy and stand against enemy. He is a real SOLDIER fighting with ANTI-MALE system.

A Real inspiration for All of US.

We stand with such fighters.


 

A CRPF jawan accused of rape turned down his victim’s marriage offer for withdrawal of case and opted to go to jail, Jharkhand’s Ghatsila police said.

Jadunath Murmu, 23, who was posted with Chhattisgarh’s 228th CRPF battalion, allegedly raped a girl from his village in Dumaria block. In her FIR at the Dumaria police station on October 4 last year, the girl alleged that Murmu sexually exploited her on the pretext of marriage.

“The girl’s family had got a band party for the marriage but Murmu turned down the proposal. He has been sent to the Ghatsila jail,” said Dumuria police station in-charge Bikrant Kumar. “The girl stressed on at least a court marriage but he denied.”

Kumar said Murmu was arrested from the Sukna CRPF camp in Chhattisgarh on Saturday.

“The case came to my notice after the girl threatened self immolation,” said Mosaboni deputy superintendent of police Ajit Kumar Bimal. “The arrest should have been immediate. Departmental inquiry will be done against the Mosabani police station. There was a court order too.”

Parents and relatives of both parties went to the police station to convince Murmu, but in vain. Kumar said the case could have ended if Murmu agreed.

http://www.hindustantimes.com/india/jharkhand-jawan-accused-of-rape-spurns-victim-s-marriage-offer-opts-jail/story-XC7KYbbRYt2i7D4cSn4gKJ.html

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे, मर के भी चैन ना पाया, तो किधर जाएंगे???

“अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे, मर के भी चैन ना पाया, तो किधर जाएंगे???”

हमारे देश में करीब 65,000  विवाहित पुरुष हर वर्ष आत्महत्या कर लेते हैं, दिनांक 30/03/2016 को भी एक लड़की से बात हुई, उसने बताया कि उसके भाई ने ससुराल वालों से परेशान होकर फांसी लगाकर, दिनांक 26/03/2016 को आत्महत्या कर ली है। उसका भाई, शादी के बाद से ही अपनी पत्नि और ससुराल वालों के कारण बहुत ज्यादा परेशान रहता था।

उसके आत्महत्या करने कि ख़बर दिनांक 27/03/2016 को कोटा, राजस्थान में अखबारों में भी प्रकाशित हुई थी।

Dainik Navajyoti Kota City1459021328Page-14

मृतक विपिन का सुसाइड नोट दिनांक 27/03/2016 को, कोटा के अखबार “दैनिक नवज्योति” में, के पृष्ठ 14 पर प्रकाशित हो चुका है, लिहाज़ा, अब यह कोई गोपनीय दस्तावेज़ नहीं है। हम यह सुसाइड नोट यहाँ जिसलिए साझा कर रहे हैं, इसका एक बड़ा कारण हैं, हमें रोज ही पीड़ित लड़कों सम्पर्क करते हैं, जिनमे लड़के अक्सर भावावेश में कहते हैं कि:

  1. मै बहुत परेशान हूँ, जी करता है कि आत्महत्या कर लूँ
  2. कानूनों में सुधार होना चाहिए, चाहे सरकार का ध्यान खींचने को मुझे आत्महत्या ही क्यों न करनी पड़े
  3. मैं आत्महत्या कर लूँगा, मुझसे मेरे माँता-पिता व परिवार की परेशानी नहीं देखी जाती
  4. अगर मैं आत्महत्या कर लूँ तो आप लोग मुझे न्याय दिलाइएगा
  5. मैं सरकार से इच्छा मृत्यु की माग कर रहा हूँ
  6. ………
  7. ……….. इत्यादि इत्यादि

सुसाइड नोट में लिखा है:

मैं काफी समय से मानसिक दबाव में चल रहा था। मेरी हैसियत नहीं थी कि मै प्रकाश नारायण, गरीमा शर्मा, विमल शर्मा, और गौरव शर्मा को निवासी 2H25 महावीर नगर विस्तार योजना कोटा (राज०) को 15 लाख रूपये दे पाता। इन लोगों ने झूठ बोलकर शादी की हमें फंसाया और इन चारो ने मिलकर हमारे घर में साजिशें की। जब से शादी हुई तब से ये लोग मुझे और मेरे परिवार को केस करने की धमकियाँ दे रहे थे। क्या मेरा अपराध ये था कि मेरा बाप नही था या फिर मेरे और मेरे परिवार ने इन लोगों की छानबीन नहीं की।

मै एक मेडिकल की दूकान पर नौकरी करता था। इन लोगों से आतंकित होकर मुझे नौकरी से हाथ धोना पड़ा। वर्तमान में इन लोगों ने खाने कमाने लायक भी नहीं छोड़ा। हमारे घर में इन लोगों की गुंडागर्दी और कोर्ट में भी इन लोगों की गुंडागर्दी।

इस गुंडागर्दी के दम पर केस भी अपने पक्ष में करवा लीये। और झूठे केसों में मुझे और मेरे परिवार को फंसा लिया। मेरे खुद की भी जान खतरे में थी और मेरा परिवार भी अब सुरक्षित नहीं है। उनकी ह्त्या भी हो सकती है।

आज दिनांक 24/3/016 को शाम को 4:30 लड़की का भाई गौरव शर्मा मेरे घर पर आया उसने मेरे भाई के साथ मारपीट भी की। और मेरी माँ को गाली-गलोच दी। इस घटना से मेरा परिवार काफी सदमे में है। और भयभीत भी है। ये लोग मुझसे पैसों कि माँग को लेकर मानसिक दबाव बना रहे थे। मेरी और मेरे परिवार की मुखबिरी हो रही थी। पता नहीं इन लोगों को क्या फायदा होने वाला था।

sd/-

विपिन शर्मा

कई लोगों को सुसाइड नोट में लिखे हालात बिलकुल अपने जैसे लगेंगे… लेकिन, गनीमत है कि इसे पढ़ने के लिए जीवित तो हैं…

प्रश्न यह नहीँ है कि मृतक विपिन ने सही किया, या गलत किया…

आपकी क्या राय है, इसका निर्णय आप करें। लेकिन हम यहाँ उन लोगों से पूछना चाहते हैं जो लोग आत्महत्या को हंसी खेल समझते हैं और मना करने के बावजूद बार बार कहते हैं कि:

  1. मै बहुत परेशान हूँ, जी करता है कि आत्महत्या कर लूँ
  2. कानूनों में सुधार होना चाहिए, चाहे सरकार का ध्यान खींचने को मुझे आत्महत्या ही क्यों न करनी पड़े
  3. मैं आत्महत्या कर लूँगा, मुझसे मेरे माँता-पिता व परिवार की परेशानी नहीं देखी जाती
  4. अगर मैं आत्महत्या कर लूँ तो आप लोग मुझे न्याय दिलाइएगा
  5. मैं सरकार से इच्छा मृत्यु की माग कर रहा हूँ
  6. ……
  7. ……. इत्यादि इत्यादि

हमारे देश में, इन्हीं सब समस्याओं को देखते हुए और यही सब सोचते हुए, हर वर्ष करीब 65,000 विवाहित पुरुष आत्महत्या कर लेते हैं। क्या किसी को भी जानकारी है, कि जिन लोगों ने आत्महत्या की है, उनकी समस्या का समाधान हो गया? कोई भी उदाहरण हो तो कृपया बताएं।

हम मरणोपरांत, किसी भी भाई की आलोचना नहीँ कर रहे हैं, अपितु जो और दुसरे लोग इस रस्ते का विचार रखते हैं, उन्हें रोकना चाहते हैं।

अपमान होने, मुकदमें होने, प्रताड़ित किए गए होने के कारण, क्या आत्महत्या करके हम अपने स्वाभिमान कि रक्षा करना चाहते हैं?

अपने परिवार कि परेशानी नहीं देखी जाती, आपके आत्महत्या करने से परिवार कि परेशानी खत्म हो जाएगी?

शुतुरमुर्ग भी रेत में सिर छिपाकर समझता है कि शिकारी से छिप गया है। क्या इस प्रकार आत्महत्या करना इसी परिधि में नहीं आता है?

“हम आत्महत्या कर लेंगे, घर वाले अपने समस्या अपने आप देख ही लेंगे”, यही सोचेंगे तभी आत्महत्या कर पाएँगे। क्या आपके बूढ़े माँता-पिता इसी लायक हैं? अगर आप खुद उनकी स्थिति को सोचने-समझने को तैयार नहीं हैं, तो आपको क्या अधिकार है किसी दुसरे व्यक्ति से, अपनी पत्नि से या ससुराल वालों से अपेक्षा करें कि, वो आपके बूढ़े माँता-पिता या परिवार के बारे में सोचें?

दूसरों ने, आपकी पत्नि ने या ससुराल वालों ने आपके माँता-पिता या परिवार को वो दुख या कष्ट दिए हैं, जिनका लड़ के निवारण किया जा सकता है, परन्तु जब आप आत्महत्या कर लेते है, तो आप खुद ही आपके माँता-पिता को, परिवार को, भाई-बहनों को, अपने ईष्ट मित्रों को अविस्मरणीय व बेहद असहनीय कष्ट देते हैं।

हमारे देश के कानून एकतरफा और अन्यायपूर्ण हैं, सही बात है। यह बात भी बिलकुल ठीक है कि अगर यह आत्महत्या, विपिन कि बजाय उसकी पत्नि ने की होती, तो विपिन और उसका पूरा परिवार अभी तक जेल में होता। लेकिन, क्योंकि आत्महत्या एक पति ने की है, अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। तो क्या कार्यवाही ना होने के विरोध में एक और आत्महत्या होनी चाहिए?

कानूनों में परिवर्तन की आवश्यकता है, लेकिन जब हर वर्ष 65,000 आत्महत्याएं होने पर भी सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ा, तो क्या किसी एक के आत्महत्या करने से पड़ेगा? अगर नहीं, तो क्यों हम यह स्वीकार नहीं करते कि इन सब समस्याओं का एक मात्र उपाय, केवल और केवल अपनी लड़ाई को जीतकर, विरोधियों को झूठा व गलत साबित कर ही किया जा सकता है।

केवल यही एक मात्र रास्ता है जिससे आपके बूढ़े माँता-पिता, आपका परिवार भी सन्तुष्ट होगा और जब हमारे आंकड़े भी बोलेंगे कि हम सब सही थे और हमारे विरोधी गलत बने हुए कानूनों का इस्तेमाल कर रहे थे, तब सरकार पर भी दबाव बनेगा और सरकार को नारिवादी शक्तियों को दरकिनार कर, कानूनों में परिवर्तन करना ही पड़ेगा।

परन्तु, यह सब जीवित रहकर ही किया जा सकता है।

“अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे, मर के भी चैन ना पाया, तो किधर जाएंगे???”

सोचो बन्धुओं सोचो, अगर जीवित ही ना रहे तो अपनी इस लड़ाई में जीत का जश्न कौन मनाएगा…

आप इस लड़के को बचाना चाहेंगे, या इसकी आत्महत्या के बाद एक और कैंडल मार्च निकालना चाहेंगे?

आज हमारा देश एक ऐसी स्थिति से गुजर रहा है जहां एक तरफ तो महिला को, पत्नि, मित्र, प्रेमिका, लिव-इन पार्टनर, यहाँ तक कि एक वैश्या के रूप में भी सशक्ति किया जा रहा है और दूसरी तरफ एक माँ, बहन, भाभी, ताई, चाची, बूआ आदि के रूप में उन्हें महिला ही नहीं माना जाता।

जब यहाँ छद्म महिला सशक्तिकरण इस कदर सर चढ़ कर बोल रहा है कि नारिवादी शक्तियों के दबाव में सरकार बिना कुछ सोचे समझे कानून बनाने पर आमादा है, तो यहाँ एक पुरुष का यह उम्मीद करना कि उसे भी न्याय मिल सकता है, बेमानी है, एक धोखा है।

एक लड़के ने एक लड़की से इस कदर प्यार किया कि अपना सबकुछ लुटा दिया, परन्तु उस लड़की ने इस लड़के का इस कदर शारीरिक, आर्थिक और मानसिक शोषण कर धोखा दिया कि उसे लगने लगा कि अब आत्महत्या करने के अलावा कोई रास्ता शेष नहीं है।      

आत्महत्या को आमादा इस लड़के को जब समझाया गया तो इसने न्याय पाने का मार्ग पूंछ, क्योंकि वो जानता है कि उसके सच के लिए भी कोई कानून नहीं है ओर जससे वह प्रेम करता है, उसके झूठ को भी समर्थन देने के लिए एक पूरा मंत्रालय है, आयोग है और हमारी नारिवादी न्यायपालिका है।

उस लड़के की हकीकत, उसी के शब्दों में:

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हम उस व्यक्ति को धन्यवाद देना चाहते हें जिसने इस लड़के को, भारत की पहली व एक मात्र पुरुष हेल्पलाइन SIF-One पर, यानी 8882-498-498 पर कॉल कर सहायता मांगने के लिए प्रेरित किया।

यह लड़का अगर सम्पर्क में न आया होता, तो शायद यह हकीकत इस लड़के के आत्महत्या करने के बाद सुसाइड नोट में ही पढ़ने को मिलती।

अब आप निर्णय करें कि आप इस लड़के को बचाना चाहेंगे और न्याय दिलाना चाहेंगे, या इसके आत्महत्या कर लेने के बाद एक और कैंडल मार्च निकालना चाहेंगे?

हमारा गांधारी समाज और वैवाहिक बलात्कार

भगवान राम ने जब सीता स्वयंवर में धनुष तोड़ा और प्रभू परशुराम क्रोधित हुए, तब लक्षमण जी ने कहा “मूंदें आँख कत्हू कछु नाहि”, अर्थात, आँख मूंद ले, कहीं कुछ नहीं हुआ। गांधारी ने भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध रखी थी, जो कि धृतराष्ट्र के अन्याय को ना देखने का भी सूचक है। ये दोनों घटनाएं मनुष्य के व्यवहार के विषय में बताती हैं कि आँखे मूंद कर सोचना की कुछ नहीं है, मनुष्य के लिये आम बात है। इससे प्रकृति भी अछूती नहीं है। शुतुरमुर्ग भी रेत में सिर छिपाकर समझता है कि शिकारी से छिप गया है।

धृतराष्ट्र के पास तो महाभारत का आँखों देखा हाल बताने के लिये तो विश्वसनीय संजय थे, परन्तु आज के समाज में हम लोग जानबूझ कर धृतराष्ट्र व गांधारी बने हुए हैं, जो कि कुछ संजय रूपी पक्षपातपूर्ण लोगों की बात पर विश्वास कर लेते हैं।

“भारत में नारीवाद” को संजय के पक्षपातपूर्ण व नकारात्मक रूप की उपाधि देना गलत न होगा, जिसकी अनर्गल बाते, निरंतर सुनकर दुर्भाग्य से हमारा समाज भी उनके निम्न झूठों पर विश्वास करने लगा है।

  • झूठ 1 – भारत मे वैवाहिक बलात्कार के कानून का प्रावधान नहीं है।
  • झूठ 2 – वैवाहिक बलात्कार – बीवियां पीड़ित हैं।

यह मान्यताएं पूर्ण रूप से नारीवादी वित्त पोषित मानसिकता से निकली हुई सोच हैं जो कि परिवार एवं पुरुष विरोधी है। हम यहाँ कुछ ऐसे महत्वपूर्ण पथ्यों को सामने लाना चाहते हैं जिनको छुपाते हुए महिलावादी, भारतीय कानूनों की आजमाइश कर रहे हैं।

पहला झूठ कि भारत में, वैवाहिक जीवन में बलात्कार का कानून नहीं है। इस विषय में 4 बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनों/प्रावधानों के प्रासंगिक अंश के साथ सूची निम्न प्रकार है:

प्रावधान 1:

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के अनुसार:

“धारा 3) घरेलू हिंसा की परिभाषा: इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्रत्यर्थी का कोई कार्य, लोप या किसी कार्य का करना या आचरण, घरेलू हिंसा गठित करेगा यदि वह-

  • व्यथित व्यक्ति के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन, अंग की या चाहे उसकी मानसिक या शारीरिक भलाई की अपहानि करता है, या उसे कोई क्षति पहुंचाता है या उसे संकटापन्न करता है या उसकी ऐसा करने की पृवित्ति है और जिसके अंतर्गत शारीरिक दुरुपयोग, यौन दुरुपयोग, मौखिक और भावनात्मक दुरुपयोग और आर्थिक दुरुपयोग कारित करना भी है; या
  • किसी दहेज ……………. ; या
  • खंड (क) या खंड (ख) में ………………………… ; या
  • व्यथित व्यक्ति को ……………………….. ; या

स्पष्टीकरण 1- इस धारा के प्रयोजनों के लिए—

  • “शारीरिक दुरुपयोग” से ऐसा कोई कार्य ……………………………
  • “यौन दुरुपयोग” से यौन प्रकृति का कोई आचरण अभिप्रेत है, जो महिला की गरिमा का दुरुपयोग, अपमान, तिरस्कार करता है या उसका अन्यथा अतिक्र्मण करता है;
  • ……………

 “धारा 18) संरक्षण आदेश: मजिस्ट्रेट, व्यथित व्यक्ति और प्रत्यर्थी को सुनवाई का एक अवसर दिए जाने के पश्चात और उसका प्रथमद्रिष्टया समाधान होने पर कि घरेलू हिंसा हुई है या होने वाली है, व्यथित व्यक्ति के पक्ष में एक संरक्षण आदेश पारित कर सकेगा पथा प्रत्यर्थी को निम्नलिखित से प्रतिषिद्ध कर सकेगा,-

  • घरेलू हिंसा के किसी कार्य को करना;
  • घरेलू हिंसा के कार्यों के कारित करने में सहायता या देष्प्रेरण करना;

“धारा 31) प्रत्थर्थी द्वारा संरक्षण आदेश के उल्लंघन के लिए शास्ति-

  • प्रत्थर्थी द्वारा संरक्षण आदेश या किसी अंतरिम संरक्षण आदेश का भंग, इस अधिनियम के अधीन एक अपराध होगा और वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो बीस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा।
  • उपधारा (1) के ………………………………..
  • उपधारा (1) के अधीन आरोपों को विरचित करते समय, मजिस्ट्रेट, यथास्थिति, भारतीय दंड़ संहिता की धारा 498क, या उस संहिता के किसी अन्य उपबंध, या दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के अधीन आरोपों को भी विरचित कर सकेगा, यदि तथ्यों से यह प्रकट होता है कि उन उपबंधों के अधीन कोई अपराध हुआ है।

इसका मतलब है कि भारत में घरेलू हिंसा अधिनियम के अनुसार:

  • “कोई” भी यौन आचरण दंडनीय है। जी हाँ, “कोई” भी।
  • संरक्षण आदेश प्रतिवादी को यौन शोषण सहित, घरेलू हिंसा के किसी भी कृत्य को करने से रोकता है। इसमें घरेलू हिंसा करने में सहायता करने वाले या उकसाने वाले भी शामिल होते है। मतलब कि ये सभी प्रतिवादियों पर लागू होता है।
  • संरक्षण आदेश के उल्लंघन का अर्थ है एक साल की जेल और धारा 498क के तहत मुकदमा।
  • “बलात्कार”, अपनी सभी ज्ञात व अज्ञात परिभाषाओं के अनुसार “यौन शोषण” की क्ष्रेणी में आता है।
  • एक और तथ्य, कि भारतीय कानून के अनुसार केवल एक महिला ही घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 में एक पीड़ित के रूप में परिभाषित है, पुरुष नहीं।

प्रावधान 2:

“धारा 377) प्रकृति विरुद्ध अपराध: जो कोई किसी पुरुष, स्त्री या जीवजन्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इन्द्रियभोग करेगा वह [आजीवन कारावास] से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

स्पष्टीकरण- इस धारा में वर्णित अपराध के लिए आवश्यक इन्द्रियभोग, गठित करने के लिए प्रवेशन पर्याप्त है

इसका मतलब यह है कि भारतीय दंड सहिंता की धारा 377 के अनुसार:

  • कोई भी “प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध” दंडनीय है। जी हाँ, कोई भी।
  • 10 साल का कारावास और आर्थिक दंड़ भी। और
  • गैर जमानती।
  • क्योंकि यह इन्द्रियभोग की बात करता है इसलिए केवल पुरुष ही अपराधी हो सकता है।
  • दंड प्रक्रिया सहिंता की धारा 41A के अस्तित्व में आने के बाद से, पूरे भारत में वैवाहिक मुद्दे सम्बंधित प्राथमिकी के नवीनतम स्वरूपों को देखें, भारतीय दंड संहिता की धारा 377, गिरफ्तारी कराने के लिये विशेष रूप उपयोग की जाती है।

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प्रावधान 3:

“धारा 498A) किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसका उत्पीड़न करना: जो कोई, किसी स्त्री का पति या पति का नातेदार होते हुए, ऐसी स्त्री का उत्पीड़न करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “उत्पीड़न” निम्नलिखित अभिप्रेत है:-

  • जानबूझकर किया गया कोई आचरण जो ऐसी प्रकृति का है जिससे स्त्री को आत्महत्या करने के लिए या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य (जो चाहे मानसिक हो या शारीरिक) के प्रति गंभीर क्षति या खतरा कारित करने के लिए उसे प्रेरित करने की सम्भावना है; या
  • किसी स्त्री को तंग करना, जहां उसे या उससे सम्बन्धित किसी व्यक्ति को किसी सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति के लिए किसी विधिविरुद्ध मांग को पूरी करने के लिए प्रपीडित करने को द्रिष्टि से या उसके अथवा उससे संबंधित किसी व्यक्ति के ऐसे मांग पूरी करने में असफल रहने के कारण इस प्रकार तंग किया जा रहा है।

इसका मतलब यह है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के अनुसार:

  • “उत्पीड़न” किसी भी प्रकार का हो सकता है और इसमें यौन उत्पीड़न भी शामिल है।
  • यह एक दंडात्मक प्रावधान है।
  • एक और गलतफहमी की 498A दहेज उत्पीड़न के बारे में है।

प्रावधान 4:

“धारा 376A) पृथक्करण के दौरान किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ संभोग: जो कोई अपनी पत्नी के साथ, जो पृथक्करण की किसी डिक्री के अधीन या किसी प्रथा अथवा रूढ़ि के अधीन, उससे पृथक रह रही है, उसकी सम्मति के बिना उसके साथ मैथुन करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

इसका मतलब यह है कि भारतीय दंड सहिंता की धारा 376A के अनुसार:

  • एक पति द्वारा ‘पत्नी’ का बलात्कार भारतीय दंड सहिंता की धारा 376 का हिस्सा है।
  • “पृथक्करण” परिभाषित न होने के कारण यह धारा विभिन्न राज्यों की प्राथमिकी स्वरूपों में आमतौर पर इस्तेमाल की जा रही है।

एक पति का बलात्कार अगर पत्नी द्वारा किया जाता है, तो उसके लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। मौजूदा कानून मे एक पति की गरिमा और जीवन का कोई मूल्य नहीं है।

विवाह के बाद, पति या पत्नी को, दाम्पत्य अधिकारों के लिए कानूनी अधिकार हैं। कानून द्वारा दिए गए दाम्पत्य अधिकार, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के अनुसार परिभाषित भी हैं।

एक प्रेमी, एक पति, को आम सहमनत के साथ बने रिश्ते के बाद, बलात्कारी करार करना धोखा है खास तौर पर जब वो रिश्ता शादी के रूप में एक पारिवारिक और कानूनी रिश्ता हो।

दूसरा झूठ: वैवाहिक बलात्कार – पत्नियां पीड़ित हैं।

महिलाओं के विषय में महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी की गयी एक रिपोर्ट का अवलोकन करें (दुर्भाग्यवश, सरकार ने इस विषय पर कोई भी सर्वेक्षण करना जरूरी नहीं समझा)

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने वर्ष 2007 में “Study on Child Abuse : India 2007” नामक एक रिपोर्ट बच्चों के उत्पीड़न के विषय में जारी की, जिसके पृष्ठ 74 पर लिखे तथ्य विचारणीय हैं:

Study on Child Abuse - India 2007-74-page-001

इसमें साफ लिखा है कि, “Among them 52.94% were boys and 47.06% girls”, इसका मतलब है कि बच्चों के साथ यौन शोषण के हर 100 मामलों में पीड़ित, 53 लड़के हैं और 47 लड़कियां हैं।

पृष्ठ 75 पर राज्यवार वितरण भी दिया हुआ है:

Study on Child Abuse - India 2007-75-page-001

सर्वेक्षण में जिन 13 प्रमुख राज्यों को शामिल किया गया उनमें से 9 राज्यों में 50% से अधिक यौन शोषण के पीड़ित लड़के हैं। दुर्भाग्यवश लड़कों के यौन शोषण के मामले में अधिकतम, 65.64% दिल्ली का है और लड़कियों के मामले में अधिकतम, 63.41% गुजरात का है। इसका मतलब है कि अधिकतम प्रतिशतों में भी, लड़कों का यौन शोषण, लड़कियों के यौन शोषण से 2% अधिक है, जबकी औसत के अनुसार, लड़कियों के यौन शोषण की तुलना में लड़कों का यौन शोषण 6% अधिक है।

लिहाज़ा, हमारी सरकार के महिलावादी धड़े के अनुसार भी, हमारे देश में लड़कों का ही यौन शोषण अधिक हो रहा है।

हालांकि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के दावे की सच्चाई पर शक कर सकते हैं क्योंकि मंत्रालय ने जन सूचना का अधिकार के माध्यम से यह कहते हुए प्रतिक्रिया व्यक्त की है कि “Protection of Men is not Ministry’s mandate”, अर्थात, पुरुषों का संरक्षण मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं है। तो यह पूर्ण रूप से माना जा सकता है कि आंकड़े एकत्र करने का तरीका और उसका प्रदर्शन महिलाओं के प्रति एकतरफा होना तय है। और इसलिए, यह आंकड़े महिलाओं के समर्थन में हर संभव तरीके से दर्शाए गए होंगे।

फिर भी, हम यह मान रहे हैं कि यह आंकड़े पूर्णतया सही है और यह हमें एक बहुत ही महत्वपूर्ण व जादूई तथ्य तक लाते हैं:

भारतीय समाज और कानून के अनुसार, लड़के, जो 53% यौन शोषण के पीड़ित हैं, एकाएक अठारहवाँ जन्मदिन मनाते ही, 0% पीड़ितों में तबदील हो जाते हैं।

क्योंकि, भारतीय समाज और कानून यह स्वीकार ही नहीं करता कि पुरुषों या पति के साथ भी बलात्कार हो सकता है।

विभिन्न सर्वेक्षणों/आंकड़ों में, यह हमेशा पाया गया है कि पुरुष भी घरेलू हिंसा, पति-जलाने जैसी घटनाओं में बराबर के पीड़ित हैं और उपरोक्त सर्वेक्षण के अनुसार तो बलात्कार और यौन उत्पीड़न में भी बराबर के पीड़ित हैं, तो हमारा समाज व कानून यह क्यों समझता है कि पति/पुरुष के साथ बलात्कार किया ही नहीं जा सकता? भले ही एक अकेला ही इस तरह का मामला हो, क्या आपको यह नहीं लगता कि उस पुरुष के पास उसकी रक्षा के लिए एक भी कानून न होना असंवैधानिक है?

तो, दोनों झूठों की वास्तविकता स्पष्ट होने के बाद, आशा है कि आप एक तथ्य पर सहमत होंगे:

भारतीय पतियों को पीड़ित के तौर पर एक वैवाहिक बलात्कार के कानून की जरूरत है और ऐसे ही एक कानून की जरूरत भारतीय पुरुषों को बलात्कार से उन्हें बचाने के लिए है।

Feedback on Collegium

To

Mr. Praveen Garg,

Joint Secretary,

Department of Justice,

Ministry of Law & Justice, New Delhi

e-mail ID: collegium-suggestions@gov.in collegium-improvement@gov.in

Subject:

Feedback in compliance to suggestions sought from general public with respect to Supreme Court Advocates on Record Association and Anr Vs. Union of India

Reference:

  1. Writ Petition (s) (Civil) No(s) : 13 of 2015
  2. Web Page notice dated 5.11.2015 in Department of Justice http://www.doj.gov.in/sites/default/files/userfiles/PUBLIC-NOTICE.pdf

We introduce ourselves as DAMAN Welfare Society, a registered NGO having its members from all across country. Here, on behalf of all our members we are sending our suggestions sought from general public with respect to Supreme Court Advocate on Record Association and Anr Vs. Union of India.

  1. The suggestions are presented in relation to following sequential manner: (1) Transparency (2) Collegium Secretariat (3) Eligibility Criteria (4) Complaints.
  2. We espouse whole heartedly the cause of 10 crore Litigants loitering the hallowed corridors of several courts seeking justice. These Litigants have to be rescued from their delusion that Justice is real and attainable and is not a distant mirage. Several freedom fighters sang the only song they knew ‘Freedom & Democracy’.
  3. There is one typical case of a person born in Hangal, Haveri District in Karnataka (http://amitdesh2k.blogspot.in/), in the year 1916 and set his feet as a Freedom Fighter at the very tender age of 12. He was jailed during the Quit India Movement and booked for Sedition. Left out of school, he continued his contribution to the freedom movement and supported the activities of the Congress party by even defying curfews.
  4. In late 1950s he filed a civil suit, to gain right over his allotted plot. After innumerable counter suits, claims and counter claims, the land still isn’t yet declared as free from any dispute. Even after almost 60 years, this said suit is still undecided, for this Freedom Fighter. This person is none other than the Late Mr. Subramaniam Acharya Akkivalli – better known as Subbannacharya who was born in 1917 and who passed away in the year 2015 without
  1. realising justice for the dispute. This could well represent the plight of any Litigant in our Country.
  • Category 1: – Transparency

1.A Transparency in Procedure and Rules

1.A.1 The Collegium Secretariat to formulate and publish the procedures and rules for appointment of any person to the higher judiciary in compliance with Article 312 of the Constitution of India.

  1. A.2 The Collegium Secretariat shall define the procedure and stages of appointment / recruitment

1.A.3 Inter alia, the following stages, Transparency in appointment proceedings from start to confirmation of a candidate for  the selection process of   permanent judgeship,  are as follows:

  • Publishing of vacancies
  • Receiving of applications
  • Evaluation of applications
  • Background verification of applicants
  • Written Exam for Evaluation
  • Interviewing of applicants
  • Ranking of applicants
  • Score cards for applicants
  • Publishing of results
  • Strict collection of Archives of candidates’ records, audio & video recordings pertaining to the appointment proceedings; maintenance and efficient digital retrieval system.
  1. A.4 The procedure and rules shall be vetted by the Executive and the Parliament concurrently.

1.B Transparency at Every Stage 

1.B.1 Transparency starts from publishing of notification of the yearly I.J.S Exams to confirmation of candidates to permanent Judgeships.

1.B.2 The applications of all candidates shall be in a prescribed form filed as a sworn affidavit and the same to be placed in the public domain e.g. Internet. The Collegium secretariat shall define the prescribed form in compliance with Article 312 of the Constitution of India.

1.B.3 All records of evaluation of records shall be made available in the public domain. E.g. Internet

1.B.4 All proceedings of the evaluation to be audio and video recorded and the same shall be placed in the public domain.

1.C Transparency in collegium secretariat’s orders 

1.C.1 All grievances on orders passed by collegium secretariat shall be subject to review by Executive and the Parliament concurrently, within a period 90 days  upon receipt of such complaints.

1.C.2 All documents and orders passed by the Collegium secretariat shall be subject to scrutiny of the Executive and the Parliament concurrently in conformity to requirement of ensuring checks & balances and counter-checks & counter-balances.

1.D Extent of Transparency 

1.D.1 All the above documents are to be uploaded on the internet for public viewing

1.D.2 All the above audio & video recording is made available at the internet kiosk of the information centre of the High Court Campus and District Court Campus to enable accessibility of the general public (exclusively).

1.D.3 All subjective analysis, feedback & scoring, evaluation of members of the Collegium Secretariat are to be audio and video recorded. The same are to be sent to the Central Repository of Archives for a period of 20 years. This information to be made available under Right to Information Act 2005 for General Public.

1.D.4 The transparency as such, shall lie outside the ambit of Official Secrets Act 1923, its amendments and any other variants of such other Statutes.

  • Category 2: – Collegium Secretariat

2.1 The Collegium Secretariat ought be modelled on Union Nations Organization’s Secretariat.

2.2. The Collegium secretariat shall comprise of 3 departmental functional roles. The Secretaries shall be a retired Supreme Court Judges. The tenure shall be for a period of 5 years. The cooling period shall be 3 years from the date of retirement to exclude favouritism for appointment of post-retirement sinecures.

  • All candidates for appointment of functional roles of the Collegium Secretariat (excluding clerical staff) shall be subject to interview and evaluation process.
  • The Prime Minister, Leader of the Opposition and Chief Justice of India, shall nominate their representatives for the selection committee and number of such representatives shall be jointly decided by them.
  • The selection committee shall propose 3 candidates for each Secretarial position, viz.,
  • Secretary for I.J.S Institution
  • Secretary for Judicial Appointment
  • Secretary for Complaints
  • The quantum of staff is to be determined based on the philosophy of a lean, mean and hungry team and based on scope, quantum and extent of work. The responsibility of determining the quantum of staff for functional and clerical roles shall vest on the Secretary nominated by the Selection Committee.
  • Any Complaints on the Collegium secretariat itself shall be subject to provisions enumerated in Category 4:- Complaints
  • The Collegium secretariat shall report to the Executive and the Parliament concurrently.

3) Category 3: – Eligibility Criteria

3.A Eligibility for Judgeship

The basic Eligibility criterion for admission to the Higher judiciary MUST be that the candidates ought to have been selected competitively and must have completed successfully the Indian Judicial Services ( I.J.S) Curriculum.

3.B Entrance Eligibility for Judgeship in Higher Judiciary

3.B.1 Sound knowledge and extent of legal attainment 

3.B.2 Sound and Ready Sagacity

3.B.3 Perspicuous and Excellent Reasoning (possessing capabilities for points for determination, pronouncing judicial decisions, reasons thereof for such judicial decision)

3.B.4 Appropriate aid of general information , inter alia, as stated in section 57 of Indian Evidence Act 1872.

3.B.5 Impeccable Integrity as well as Honesty,  must uphold, preserve, protect and defend the Constitution of  India, and qualities must be visibly demonstrated, recorded and must have the stamp of sterling gold.

3.B.6 Exhibit excellent competency and Probity in Life.

3.B.7 All recruitment and administration are to be brought under the strict aegis of  Article 312 of the Constitution of India  and all candidates  are to be  brought under the ambit of  Indian Judicial Services (I.J.S)

3.B.8 Every candidate ought to have undergone 5 years training from the I.J.S Institution for being appointed as a District Judge at the entry level and must have served as a District Judge for 5 years before being considered for a post in the Higher Judiciary.

3.B.9 One family one position  For a period of every 20 years, only one person from any family is to be appointed as a Judge. This  brings under the fold   his parents, grandparents, parents-in-law, uncles, relatives ( include blood relatives and relatives-in-law)

3.B.10 Applications with sworn affidavits on Assets & Liabilities of Prospective Judges and, their family members and blood relatives have to be furnished before the start of the selection process.

3.B.11 The affidavits shall provide details pertaining to past and present officers of the court viz., pubic prosecutors, lawyers and the Judiciary ( sitting and past members of the Bench)

3.B.12 Every promotion/ elevation of a judge shall be subject to evaluation of written, oral, judgemental skills and integrity, till retirement.

3.B.13 Every 3 years, Judges shall be subject to Competency evaluation of written, oral, judgemental skills and integrity, till retirement.

  1. Where from this basic eligibility of I.J.S springs from the unpolluted stream of the Constitution of India?

3.C.1 Article 312 of The Constitution of India enumerates the creation of I.J.S.

3.C.2 Article 312 (4) clearly states that I.J.S is part and parcel of The Constitution i.e, if any amendments necessary for giving effect to the provisions of Law, the same shall not be deemed to be an amendment of the Constitution for the purpose of Article 368.

3.C.3 In other words it is subsumed under the basic structure of the Constitution of India. Hence it is beyond the scope and reach of any judicial review by the Judiciary. And this position is unassailable.

3.C.4 Any further inordinate procrastination is tantamount to denial of true administration of justice.

3.C.5 Article 312 is given below:

  1. All India Services

(1) Notwithstanding anything in Chapter VI of Part VI or Part XI, if the Council of States has declared by resolution supported by not less than two thirds of the members present and voting that it is necessary or expedient in the national interest so to do, Parliament may by law provide for the creation of one or more all India services (including an all India judicial service) common to the Union and the States, and, subject to the other provisions of this Chapter, regulate the recruitment, and the conditions of service of persons appointed, to any such service

(2) The services known at the commencement of this Constitution as the Indian Administrative Service and the Indian Police Service shall be deemed to be services created by Parliament under this article

(3) The all India judicial service referred to in clause ( 1 ) shall not include any post inferior to that of a district judge as defined in article 236

(4) The law providing for the creation of the all India judicial service aforesaid may contain such provisions for the amendment of Chapter VI of Part VI as may be necessary for giving effect to the provisions of that law and no such law shall be deemed to be an amendment of this Constitution for the purposes of article 368

3.C.6 Any judge within the territory of India assumes office by taking the following Oath

“I do solemnly swear (or affirm) that I will faithfully execute the Office of Judicial Officer, and will do to the best of my Ability, preserve, protect and defend the Constitution of the India”

When such is the sweep, operation and grandeur of the oath of any judicial officer, the creation, administration and management of I.J.S is one of most paramount aspects of bedrock of the judiciary. This is not something outside the ambit of The Constitution of India to be given a go-by.

3.C.7 The Renowned scholar and an ardent admirer of The Indian Constitution, Granville Austin, would have become a shrinking violet in his grave if the I.J.S were not implemented.

3.C.8 We humbly and respectfully submit that in 2016 the first academic calendar of IJS is to be established. As an interim measure eligible and competent candidates maybe conferred with I.J.S to carry-out their official duties.

  1. C. Creation of I.J.S Institution

An autonomous institution modelled on the I.A.S Academy , Dehradun is to be established for Indian Judicial Services ( I.J.S). Natural citizenship and not acquired citizenship will be the basic eligible criterion. Any graduate, irrespective of the fact that such a candidates is a student of Medicine, Engineering or Science or Arts or Law can apply for the entrance exam. There shall be no bar whatsoever

The Collegium Secretariat shall assume the following functional roles, subject to the vetting concurrently by the Legislative and the Executive:

3.C.1 Formulate the 5 year comprehensive curriculum,

3.C.2 Conceive the infrastructure facilities required and location of the institution

3.C.3 Identify the training facilities and faculty  and necessary appointment

3.C.4 Supervise the administration of the training facilities

3.C.5 Any breach of consistency or glaring leaps of the Rules& Procedures and legal formulations of the I.J.S  shall be dealt with punitively along with fines.

  1. D. Implementation of I.J.S Institution

3.D.1 Legislation of necessary statutes  by the Parliament  in accordance with Article 312 of the Constitution of India for establishing the I.J.S Institution

3.D.2 Speedy and necessary implementation by the Executive for compliance to Article 312 of the Constitution of India

  1. E. Reporting Structure of I.J.S

3.E.1 Reporting structure:

  • The I.J.S Governing Body shall report to the Collegium secretariat;
  • The Collegium secretariat shall report concurrently to
    • The Executive
    • The Parliament.

3.E.2 The above reporting structure is essential to ensure checks & balances and counter-checks & counter-balances by the pillars of the Democracy.

3.E.3 This reporting structure is required to ensure the ‘True Administration of Justice’.

3.E.4 This is in accordance with ‘Doctrine of Separation of Powers’ and this is an inalienable aspect of the Constitution of India.

  1. F. Entrance Eligibility for I.J.S

3.F.1 All recruitment and administration are to be brought under the strict aegis of  Article 312 of the Constitution of India  and all candidates  shall  be brought under the ambit of  Indian Judicial Services (I.J.S)

3.F.2 One family one position  For a period of every 20 years, only one person from any family is to be appointed as a Judge. This  brings under the fold   his parents, grandparents, parents-in-law, uncles, relatives ( include blood relatives and relatives-in-law)

3.F.3 Applications with sworn affidavits on Assets & Liabilities of Prospective Judges and, their family members and blood relatives have to be furnished before the start of the selection process.

3.F.4 The affidavits shall provide details pertaining to past and present Officers of the Court viz., Pubic Prosecutors, Lawyers and the Judiciary ( sitting and past members of the Bench)

3.F.5 Applicant ought have following pre-requisites:

  1. He is a natural citizen of India.
  2. He ought to have completed the age of 30 years.
  3. He has obtained any degree in Medicine or Engineering or Science or Arts or Law
  4. He fulfils other conditions as may be specified by the Collegium Secretariat from time to time.
  5. He fulfils the background checks and other verification

4)Category 4: – Complaint

4.1   John Milton has quoted “They also serve who only stand and wait” and this should not be made applicable in the appointment of Judges, for academic credentials, competency and unblemished records of service / achievement should not go unrewarded.

  • Complaints ought to be received without prejudice at all stages till the candidates are confirmed with permanency of Judgeships. Inter alia, the stages that are brought under the fold of complaints are:
  • Potential candidacy,
  • Shortlisted candidacy
  • To be-appointed candidacy
  • Probationary candidacy
  • Judgeships awaiting permanency.
  • All Complaints to be in Affidavit format with an undertaking that

“ The complaints if unproved beyond a reasonable doubt, then the complainant shall be subject to criminal prosecution under section 340 Cr.P.C read with sections 190 and section 211 of the Indian Penal Code”

  • Enquiry ought to be conducted in the presence of the complainant and proceedings to be audio and video recorded, in furtherance of section 327 of Cr.P.Code.
  • Once a complaint is taken cognizance of, the complainant ( a litigant or a lawyer) shall not appear before the Respondent Judicial Officer in the court in which he Presides as a sitting Judge.
  • All records ought to be archived for a period of 20 years in electronic and physical formats.
  • Amendment of the Indian Penal Code on treason is necessary to address commissions/ omissions for perpetuating fraud on the selection of Judicial appointments to the Judiciary. If indeed, the Constitution of  India  has to reign Supreme  as  originally  envisaged by the Founding Fathers and which is integral to the very survival of Democracy, no perpetuation of fraud on the selection of Judicial appointments can be tolerated.  Hence, the offences shall be tried under Indian Penal Code, Criminal Procedure Code and Indian Evidence Act,1872 on charges of ‘ High Treason’ . Inter alia, the Offences are as follows:
  • Furnishing false affidavit by the candidates
  • Furnishing false/ incomplete background verification by Intelligence Bureau or other agencies involved.
  • Malafide intent to scuttle scrutiny of a meritorious candidate
  • Any other offence of fraud

5) Conclusion

The instance of the Late Mr. Subramaniam Acharya Akkivalli (Freedom Fighter) who was born in 1917 and who passed away in the year 2015 without realising justice for the past 60 years of litigation, is indeed a powerful instance and significant portrayal of the legal maxim “ Justice Delayed is Justice denied” Is this what represents the true spirit of democracy and administration of Social Justice? If this were to be reversed and the pristine glory of democracy and administration of social Justice are to be established in all its might & grandeur, then the above suggestions ought to be taken cognizance of and implemented in its true spirit and in words for the realisation of democracy and true administration of Justice which is best summarized as follows:

  • With India becoming a litigant-freak-nation it is all the more important that the above suggestion are viewed seriously for implementation
  • In each and every stage it is necessary that checks & balances, counter-checks & counter-balances are incorporated and strictly adhered to, to ensure that the pillars of the democracy/ State are in their firmest state. Specific conclusions for each and every category are as follows:

5.1) Category 1 – Transparency

  1. Transparency is the ‘key driver’ for (1) procedure and rules for selection of judges, (2) transparency at all stages of evaluation & (3) transparency in collegium secretariat’s orders
  2. Audio & video recording is mandatory for each and every stage of judicial appointment
  3. All documents ought to be internet enabled
  4. The transparency as such, shall lie outside the ambit of Official Secrets Act 1923, its amendments and any other variants of such other Statutes.

5.2) Category 2: – Collegium Secretariat

  1. Collegium secretariat ought to be modelled on Union Nations Organization’s Secretariat.
  2. The Collegium secretariat shall comprise of 3 departmental functional roles viz., (1) I.J.S Institution, (2) Judicial Appointments and (3) Complaints.
  3. The Prime Minister, Leader of the Opposition and Chief Justice of India, shall nominate their representatives for the Collegium Secretariat selection committee and the number of such representatives shall be jointly decided by them
  4. The business of the Government is governance and not Business, similarly the business of the Judiciary is administration of justice and not the Business of Administration. Hence the prerogative of administration shall rest with Collegium Secretariat

5.3) Category 3 – Eligibility Criteria  

  1. J.S completion is a vital pre-requisite for consideration of Judgeship
  2. Other important pre-requisites are (1) Sound knowledge and extent of legal attainment (2) Sound and Ready Sagacity (3) Perspicuous and Excellent Reasoning (4) Appropriate aid of general information (5) Impeccable Integrity as well as Honesty (6) Exhibit excellent competency and Probity in life.
  3. The creation of I.J.S is in consonance with Article 312 of The Constitution of India.
  4. As per Article 312 (4) I.J.S is part and parcel of The Constitution and any amendments made, shall not be deemed to be an amendment of the Constitution for the purpose of Article 368. In other words it is subsumed under the basic structure of the Constitution of India. Hence it is beyond the scope and reach of any judicial review by the Judiciary. And this position is unassailable.
  5. Any graduate, irrespective of the fact that such a candidate is a student of Medicine or Engineering or Science or Arts or Law can apply for the entrance exam.
  6. Any breach of consistency or glaring leaps of the Rules and Procedures and legal formulations of the I.J.S shall be dealt with punitively along with fines.
  7. Every candidate ought to have undergone 5 years’ training from the I.J.S Institution for being appointed as a District Judge at the entry level. He ought to have served as a District Judge for 5 years before being considered for post in Higher Judiciary.
  8. Only one person from any family shall be appointed to the post of judgeship to the complete exclusion of his relatives and the applicable period shall be 20 years.
  9. Sworn affidavits shall accompany applications for Judgeship pertaining to assets & liabilities of the Prospective Judges and his relatives jointly and severally.
  10. Every promotion/ elevation of a judge shall be through a process of written, oral, judgemental skills and integrity evaluation till retirement.
  11. We humbly and respectfully submit that in 2016 the first academic calendar of I.J.S is to be established. As an interim measure eligible and competent candidates maybe conferred with I.J.S to carry-out their official duties.

5.4) Category 4 – Complaints

  1. All Complaints shall be in the form of Affidavits and if the Complaints are proved baseless the Law of Retribution namely Perjury shall be applicable on the complainant
  2. All enquiries to be audio and video recorded, in furtherance of section 327 of Cr.P.Code.
  3. Any Perpetuation of any commission/ omission for fraud on the selection of Judicial Appointments shall incur the wrath of punishment for offences of ‘High Treason’.

There is a world of difference between ‘A Government’ and ‘The Good Government’. For the sustenance of Good Government, the true administration of Justice is its firmest pillar.

Hence, our suggestions ought to be considered for implementation for realising Good Government.

Thanking you,

Jai Hind!

Anupam Dubey

Chairman

DAMAN Welfare Society

128/533, Y-1, Kidwai Nagar, Kanpur Nagar – 208 011

Cell: 9889188810

Email ID: anupamdubey@daman4men.in, anupamdubey@hotmail.com